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२३ बरस…/ सुनील वर्मा

२३ बरस पहले…

यूँ ही खून से लथपथ…

रोती बिलखती…नग्न देखा था तुमको…

ए मेरी लाडली…!

और आज….तेईस बरस बाद…

फिर उसी खून से लथपथ…अर्धनग्न देखा है तुमको….

किन्तु आज तुम…

रोती क्यों नहीं हो लाडो….!

पथरा क्यों गई हैं आँखे तुम्हारी…

कहाँ गए वो भाव चेहरे के….!

कहाँ गई वो जीवन की धारा…?

काश कि सुन पाऊं…तुम्हारे मुख से…

जीवन की वो किलकारियां…फिर से आज मै…!

 मिट गई इंसानियत…दरिंदों ने तुम्हारे वस्त्र नोच लिए…

तो क्या हुआ…

तुम्हारा खून से लथपथ…ये तन ढापनें के लिए…

देश में दो सूत कपास तो बाक़ी होगी…!

बाकी तो होगी…करोड़ों पलकों में हया की लाली भी…

कि आज तेईस बरस बाद…

देखकर जवान शरीर को अर्धनग्न तुम्हारे…

लज्जा से बंद हो जाएँगी…

इसीलिए ए लाडो…

तेईस बरस पहले की तरह…

बस थोडा सा रो दो…

ताकि बहदवास चित्त को हमारे…

विश्वास हो जाये…

कि ज़िंदा हो तुम…!

किन्तु तुम तो….निष्ठुर बन गई हो शायद…!

एकटक देख रही हो..सुनसान आँखों से अपनी…

रोती भी नहीं….आह भी नहीं होठों पर…

पत्थर बन गई हो तुम…

कोई तो बता दे….

कि क्या हो गया है…

लाडों को मेरी….!!

by

Dr Sunil Kumar Verma

Delhi Gang Rape Case-Damini-Wo-Desh-Ki-Beti

Wo Desh Ki Beti

This poem depicts the pain of a ‘father’ who saw his daughter naked for the second times, after 23 years since her birth, after she was gang raped and thrown in the streets. Father asks the country if it has ‘two threads of cotton’  to cover the naked body of his daughter!

Damini-Gang-Rap1-Case

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