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Wo Desh Ki Beti….! वो देश की बेटी…/ सुनील वर्मा

मेरे क्षत विक्षत शरीर को

श्रद्धांजलियां दे दी..

‘देश की बेटी’ भी बना दिया मुझको…

किन्तु मत कहो कि मर गई हूँ मै…

मरी नहीं हूँ…

देश की लाँखो-करोडो बेटियों में…

जिन्दा हूँ मै…

 

जिन्दा हू शहर की जगमगाती रोशन सड़कों पर…

सरपट दौड़ती हर उस बस में…

कि जहाँ आज भी वो मनचले लोग…भीड़ का बहाना कर…

जहाँ तहां छूकर मुझे…

लाज से तार-तार कर देते है हर रोज…

हर उस टेक्सी और ऑटो में जिन्दा हू मै…

कि आज भी बैठकर जिनमे

मुझको भी पता नहीं होता…

कि कौन सी मंजिल पर पहुंचा दी जाऊगी मै…!

निठारी ही नहीं…

हर उस कीचड से भरे गटर में…

न जाने कब से लाचार पडे हुए..

क्षत्-विक्षत उन कंकालो में जिन्दा हूँ मै..

कि जहाँ बस खेल-खेल में…

हवस का वो भूखा दरिंदा…

तार-तार कर जाता है बचपन मेरा…

जिन्दा हूँ हर उस गली उस चौराहे पर मै…

कि जहां इकट्ठे होकर आज..

आप सब वो ही मातम मना रहे है…

जो छह बरस पहले…

निठारी में मेरी निर्मम हत्याओं पर मनाया था…

इसी भीड़ में…

वो…या उस जैसा ही कोई और नर-पिशाच भी होगा शायद…

जिसने छह बरस पहले..

नम कर दिया था तुम्हारी आँखों को…!

 

समय साक्षी है…

कि जब चलती हुयी बस में…

उन नर पिशाचों ने मिलकर…

मेरी लज्जा और मेरी आत्मा को ही नहीं…

मेरे नश्वर शरीर को भी निर्दयता से क्षत-विक्षत कर डाला था…

तब वो असहनीय असीम दर्द पाकर..चीखी जरुर थी मै…

किन्तु रोई नहीं थी…

और आज यहाँ प्रभु कि परम गोद में बैठकर भी…

बिलख-बिलख कर रो रही हूँ मै…

ये देखकर…

कि श्रद्धांजलि में मिली…

मेरे हिस्से की वो एक मोमबत्ती…

अभी थोड़ी देर में बुझ जायेगी…

निठारी में उठी चीखो कि तरह…

चलती हुई बस से निकली दर्द की मेरी वो चीखे भी खामोश हो जायेगी…

मेरी भयावह मौत का मातम मनाता ये देश…

रोजी-रोटी और वोट की तलाश में फिर से मशगूल हो जायेगा…

और तब…

यही इसी चैराहे पर…

मुझे मेरे हिस्से की एक मोमबत्ती देता..

भीड़ में छिपा वो नर-पिशाच…

फिर किसी निठारी या चलती हुयी बस में…

किसी मासूम को निर्ममता से अपनी हवस का शिकार बनाने के लिए…

निकल पड़ेगा..!!

 

मुझे एक मोमबत्ती…

या किसी के लिए सजा-ए-मौत नहीं चाहिए…

चाहिए मुझे…

मेरी मौत पर गुस्से से तमतमाई इन्ही करोडो आँखों में…

बस थोडा सा सम्मान…

मेरे नारीत्व के लिए…!!

(Dr Sunil Kumar Verma)

Watch a Video based on above poem

narrated by the author Sunil Kumar Verma himself

‘Wo Desh Ki Beti, is dedicated to ‘Damini’ a female physiotherapy intern who was beaten and gang raped in Delhi on 16 December 2012, and died thirteen days later while undergoing emergency treatment in Singapore for brain and gastrointestinal damage from the assault!

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