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भैया मेरे…/ सुनील वर्मा

भैया मेरे…

इस बार जब रक्षा बंधन पर…

राखी का वो सूत्र बांधूंगी तुमको…

तो उपहार में सोना-चांदी नहीं…

एक पिस्तोल दे देना मुझको…

ताकि मेरी रक्षा करने का…तुम्हारा वो वचन…

चलती हुई बसों में भी…

पूरा हो सके…!

 

बाबुल ने कहा था…

कि अच्छी पत्नी बनना…

और अच्छी माँ बनकर…

बिछ जाना इस जीवन पथ पर…

उफ़ तक नहीं करना तुम…!

दो गज जमीन में कहीं भी…

कभी पत्नी…

तो कभी माँ बनकर…

बिछ तो रही हूँ मै सदियों से…

निभा तो रही हू धर्म अपना…

किन्तु बिछा कर उसी जमींन में…

जब कुत्तों की तरह भम्भोड़ते है वो…

तो वो असीम दर्द…

सहन नहीं होता भैया…

 

तुम्ही बताओ…

सहूँ कैसे इन दरिंदों की वहशियत…

कैसे बचाऊँ

चलती हुई बसों में…

अपने इस शरीर को क्षत-विक्षत होने से भैया…!

कैसे रखू मान…

रक्षा करने के तुम्हारे उस वचन का…

इसीलिए तो कह रही हूँ…

कि इस बार…

रक्षा-बंधन पर सोना-चांदी नहीं…

बस एक पिस्तोल दे देना मुझको…

भैया मेरे…!

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