मेरा नारीत्व ही…! / सुनील वर्मा

मेरा नारीत्व ही…

मेरा अपराध है…!

जो कि अश्वत्थामा के सड़े हुए घाव की तरह…

अभिशाप बन रिसता रहता है दिन और रात…!

इसी अपराध बोध में

सहम-सहम कर चलती हूँ मै…

शहर की उन्ही सड़कों पर…

जो उन्मुक्त है तुम्हारे लिए…!

 

इसी अपराध बोध में…डरी-सहमी…

उन्ही बसों के कोनों से चिपक जाती हूँ मै…

जो  कि स्वच्छंद है तुम्हारे लिए…!

 

इसी अपराध बोध में…

सुनती रहती हूँ तुम्हारे फूहड़ कमेंट्स…

कभी शरीर…तो कभी आत्मा पर अपनी…!

 

इस बार…

जब किसी चलती हुई बस में…

 नोंच-नोंच कर मार डालोगे तुम मुझको…

तो जाकर उस ईश्वर के दरबार में…

उसी से पूछूंगी मै…

कि नारीत्व है जब अपराध…

तो बनाया क्यों है उसने…

चलाता क्यों नहीं…

सुन्दर सी दुनिया को अपनी…

मेरे नारीत्व के बिना…!!

by

Dr. Sunil Kumar Verma

Wo Desh Ki Beti

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