क्या वो बलात्कार था…? / सुनील वर्मा

तुमने बलात्कार तो…

मेरी आत्मा का किया था दरिंदों….!

जो कि तुम करते आ रहे हो…सदियों से…!

किन्तु मेरे नश्वर शरीर के साथ…उस दिन..

लोहे कि छड़ों से जो किया तुमने…

वो क्या था…?

क्या वो भी बलात्कार था…?

लोहे की छड़ों से बलात्कार नहीं होता…

होता है क्या…?

तुमने जो किया है…

वो बलात्कार नहीं…कुछ और ही है…

कि जिसकी परिभाषा…न तो कानून की किताब में है अभी…

और ना सडको पर बगावत करते…बलात्कार के लिए कानून बनवाते…

करोडो मन-मंतिष्कों में…

मेरी आत्मा के बलात्कार कर डालने की सजा तो…आज नहीं तो कल…

दिलवा ही दोगे तुम उनको…

किन्तु उस वीभत्स अत्याचार का क्या…जो उन दरिंदों ने किया था…मेरे इस नश्वर शरीर पर…

लोहे की छड़ों से…

कि जिसकी परिभाषा भी नहीं है तुम्हारे पास…

कि जिसको बोलते हुए भी शर्म आती है तुम्हे…

हिम्मत है तो नाम देकर दिखाओ…

उस अमानवीय अत्याचार को…

ताकि भविष्य में तुम्हारे जैसे ही बुद्धिजीवी…

‘बलात्कार’ के साथ-साथ…उस अमानवीय, अनाम अत्याचार की सजा भी…

मुक्कर्र करवा सकें…

और जिसका जिक्र करते हुए…

फिर शब्द कम न पड़े…

और चलती हुई बस में…

मेरे साथ हुए उस ‘अनाम’ वीभत्स अत्याचार को…

बस ‘बलात्कार’ का नाम देकर…

मेरे शरीर का…

तिरस्कार न करते रहें…लोग…!!

Delhi Gang Rap1 Case 16 December 2012, DaminiThis poem depicts the pain of the 16 December rape victim ‘Damini’ who asks the country whether it was just a ‘rape’ or more than ‘rape’ that happened with her in the moving bus in Delhi on the night of 16th December! She raises the question whether the heinous crime of ‘assulting a female by inserting the iron rods in her private parts’ can just be said as ‘rape’ and whether such crime has been defined in the Indian law at present? ‘Damini” then question that the ‘existing’ or newly formed ‘rape’ laws may not provide her a justice until the brutal act of ‘assaulting by inserting iron rods in body’ is identified and defined in the law!!

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