क्या दोष था मेरा…? / सुनील वर्मा

क्या दोष था मेरा…

क्या गलती की थी मैंने…

कि जिसकी सजा मिली मुझको…!

 

हाँ की तो थी गलती…

मेरी ही जैसी किसी औरत की कोख से जन्मे…

इन इंसानों को अपना भक्षक नहीं…

रक्षक समझने की गलती…

की तो थी…!

 

की तो थी गलती ये सोचकर…

कि मुझसे ही जन्मी है ये दुनिया…

मेरी भी है ये गलियां…ये रास्ते…

कि बनाने में जिनको…

सिर्फ तुम्हारा ही नहीं…

मेरा पसीना भी बहा है…

कि मेरे भी है यें दिन यें रात..

.कि जिनमे कभी माँ….तो कभी पत्नी बनकर….

प्यार कि छांह लुटाती हूँ तुम पर…

 

या कि बहन बनकर कभी…

इन गलियों, इन रास्तो से ही नहीं…

युद्ध-स्थल से भी…

सुरक्षित लौट आने की…तुम्हारे

कामना करती हूँ…!

 

याद है मुझे

कि अभी कल ही तो…

अपनी इसी कोख से जन्म दिया था तुमको…

कि अभी कल ही तो…

भूख से बिलखते जिगर के टुकड़े को तुम्हारे…

अपनी छाती का अमृत पिलाया था मैंने…

 

यही गलती की थी शायद…

कि करके ये सभी..

सोचने लगी थी मै…

कि मुझसे ही जन्मे…

मेरे वो अपने हो तुम…

कि जिससे कभी खून…तो कभी आत्मा का रिश्ता है मेरा…!

कि जिससे कभी भूख…

तो कभी दूध का रिश्ता है मेरा…!

कि जिससे कभी निबाह…

तो कभी विश्वास का रिश्ता है मेरा…!

 

और यही सोचने की…

गलतियों की सजा….

उस दिन चलती हुई बस में…

दे डाली तुमने मुझे…!

धन्यवाद तुम्हारा…

कि ऐसा करके…

मेरी आँखे खोल दी तुमने…

मिटा दिया भ्रम…

कि जीवन की इस चलती हुई बस में…

तुम्हारी हमसफ़र नहीं हूँ…

बस साधन मात्र हूँ मै…

तुम्हारी हवस पूर्ति का…!

वो साधन…

जो कि कभी खून…

तो कभी दूध बनकर…

रगों में दौड़ता है तुम्हारी…

ताकि चलती रहे तुम्हारी सांसें…

और जिन्दा रहो तुम…

चलती हुई बसों के…

तुम्हारे इस समाज में…

मुझे मेरा स्थान याद दिलाते रहने के लिए…!!

by

Dr. Sunil Kumar Verma

Damini - Delhi Gang Rape Case

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