ड्रेस कोड…/ सुनील वर्मा

सड़क पर चलती..

हर एक औरत के लिए…

एक ‘ड्रेस कोड’ बनवाएंगे हम…

ताकि ढका रहे नारी का वो शापित-पतित शरीर…

देखकर जिसको…वहशीयत जाग जाती है हमारी…

दरिंदे बन जाते है हम…

रेप कर डालते है…चलती बसों में….

ये ”ड्रेस’ ही तो है…सारी दरिंदगी की जिम्मेदार…

वरना हम दरिंदे थोड़े ही है…?

ये ड्रेस ही है…जो दरिंदा बना देती है हमे….

और ये लो…..

उसी मनहूस ‘ड्रेस’ को आज….

नोच-नोच कर शरीर से तुम्हारे…

सड़क पर फेंक दिया है हमनें…

यहाँ सुनसान सड़क पर…बिलकुल अकेली हो तुम…..

फिर भी बिलकुल सुरक्षित हो…देखो…

यहीं सड़क पर पड़ी रहना…

रेप तो रेप…पाकर अर्धनग्न तुमको…

कोई रुकेगा भी नहीं कोई….देखने के लिए तुम्हारा ये नग्न शरीर…

आह विस्मय…!

मैंने दरिदों के उस फतवे को सुना था….

जो एक ‘कोड’ देना चाहता था…नारी की ‘ड्रेस’ को…

ऐसा कोड….ताकि जगमगाती-रंगीन सडको पर शहर की…

ढका रहे नारी का वो शरीर…देखे न कोई…वहशीयत से उसे…

आज बिना किसी ड्रेस के….

अर्धनग्न उसी शरीर के…

सड़क पर पड़े होने की खबर पढ़ रहा हू मै…

पढ़ रहा हूँ…

कि कोई भी रुका नहीं आज…देखने के लिए वो नग्नता…

या कि पाकरअकेली अँधेरी सड़क पर …

अर्धनग्न उस युवती को….

रेप कर डालने को उसका….!

किसी की दरिंदगी नहीं जागी….

विस्मित हूँ मै….

कि जिस ‘ड्रेस’ की उपस्तिथि शरीर पर…

हमे दरिंदा बना देती है…

बलात्कार के बाद…उसी ड्रेस की अनुपस्तिथि…उसी शरीर पर….

हमे ‘भाई’ बनाकर उसका….सडको पर उतार देती है….!

‘देश की बेटी’ बन जाती है वो….!

ये कौन सा रोग है हमे…

कि नारी की बेचारगी….असहायता….

बलात्कार के बाद…वस्त्रों को नोच लिए जाने के बाद की निर्वस्त्रता…

हमे भाई बना देती है उसका…

और जब वही नारी…

खिलती-मुस्कुराती कली सी जीवित…

सडको पर इठलाती है….

तो दरिंदे बन जाते हैं हम….

बन जाती है वो हमारी मस्ती का सामान….

पूछता हूँ मै…

कि सड़क पर चलती….खिलती-मुस्कुराती सजी-संवरी वो नारी…

बिना किसी चलती हुयी बस में नुचे…

हमारी बहन या बेटी क्यों नहीं बन सकती…???

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