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यें पथ-प्रदर्शक…! / सुनील वर्मा

मैंने श्रृंगार किया था…

तुम्हारे लिए…!

ताकि गंगा सी सुसज्जित….

और निर्मल रहकर भी…

अतृप्त आहत मन की तुम्हारे….

तृषा बुझा सकूँ…

दे सकूँ चिर शान्ति पलकों को…

ला सकूँ एक छोटी सी मुस्कुराहट…

अशांत मुरझाए चेहरों पर…

मुझे क्या पता था…

कि मेरा श्रृंगार शांत नहीं…

अशांत करने लगा है तुमको…

कि मेरी निर्मलता इंसान नहीं…

हैवान बना देती है तुमको…

अच्छा किया…

कि बोल दिया तुमने…

कि ‘लिपी-पुती’ ना दिखूं मै…

अशांत न करू तुमको…

कारण न बनू…

तुम्हारी इंसानियत की मौत का…

ताकि भविष्य में…

तुम्हारे जैसे ही किसी इंसान की…

दरिंदगी न जागे…

न खाए मुझे कोई..

चलती हुई बस में नोच-नोच कर…

बची रहे इंसानियत…

और बचा रहे अस्तित्व…

मेरी उसी कोख का…

कि जिसको सिर्फ मेरे लिपी-पुती होने की वजह से…

फाड डालते हो तुम…

और जिससे तुम्हारे जैसे ही कई

पथ-प्रदर्शकों को…

जन्म लेना है…!!

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