एक और दामिनी…!! / सुनील वर्मा

अभी कल ही तो…

चलती हुई बस में…

दरिंदों ने नोच-नोच कर उसको…

मार डाला…!

खत्म कर दिया छोटी सी दुनिया को उसकी…

और तुम कहते हो…

कि चला गया २१ दिसम्बर भी…

कहाँ खत्म हो गयी दुनिया…!

 

हो तो गयी…

हो तो गयी खत्म इंसानियत…!

अब इस इंसानियत विहीन

कंकर-पत्थरों से बनी दुनिया को…

दुनिया कहते हो तुम…?

 

क्या करोगे इस दुनिया का तुम अब…

मनाओगे रंगरेलिया पहली जनवरी को…

खुशी में नए साल के आने की …

या कि इस खुशी में..

कि एक साल और बीत गया…

और जवान हो गयी एक और दामिनी…!!

 

शर्म करो ऐ हैवानो…!

कुत्तों की तरह भम्भौड़ डाला है जिसे तुमने…

वही कोख है वो…

की जिससे जन्म लिया है तुमने…!

वहां दूर बैठी…

तुम्हारी माताएं

इस कृत्य पर तुम्हारे…

शर्मशार हैं…

फफक-फफक कर रो रहीं है वो…

भयभीत भी हैं…

की कहीं अगली बार…

किसी और चलती हुई बस में…मौका पाकर

उसकी कोख को भी भम्भौड़ न डालो तुम…

नोच-नोच कर खा न जाओ…

जैसे खा लिया था तुमने…

अ-सहाय दामिनी को कल…!!

 

 

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