सेवेंनटीन ऑफ इनक्रेडिबल इंडिया…/ सुनील वर्मा

एक इनक्रेडिबल देश का…

सत्रह साल का दरिंदा हूँ मै…

और यह साल…

मेरी दरिंदगी के लिए…विशेष साल है…

इस साल…

पार कर जाऊँगा मै…दरिंदगी की पराकाष्ठाए…

नोच डालूँगा….चलती हुई बस में…

किसी मासूम का शरीर…

अर्धनग्न कर लहुलुहान…

सड़कों पर फेंक दूँगा उसे….

हाँ….

मुझे डर नहीं लगता….

क्योकि मुझे पता है….

की सत्रह साल का हूँ मै…

और इस इनक्रेडिबल देश का…अंधा और विकलांग कानून…

यह सिद्ध करके भी…कि मैंने ही किया है ये सब….

कि एक वहशी दरिंदा हूँ मै…

कुछ उखाड नहीं पायेगा मेरा…!

क्योकि पता है मुझे…कि एक साल बाद…

ये इनक्रेडिबल देश….मुक्ति का उपहार देगा मुझे…

देना ही होगा इसको…

क्योकि इस इनक्रेडिबल देश का कानून…

सत्यमेव जयते है…

और सत्य यही है…कि मेरी उम्र सत्रह साल है…

इस उम्र में की गयी…कोई भी दरिंदगी मेरी…

देश को भूलनी ही होगी…सिर्फ एक बरस बाद…

धन्यवाद मेरे प्यारे देश…

और सडको पर चलती…अप्सराओं सी दिखती…दामिनियों…

आई विल सी यू…आल..

आफ्टर वन ईयर…!!

The Poem ‘Seventeen of Incredible India’ highlights the helplessness and inability of Indian Legal System to punish a 17 year old heinous criminal and rapist beyond 18 year of his age only because he was just 1 year less than the defined age of becoming mature as per existing India law, and that he can not be punished for a crime committed by him before 18, beyond the 18 years of his age!!

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